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Homeबिजनौरहोली का शुभ मुहूर्त एवं मनाने की प्राचीन प्रक्रिया पर मार्गदर्शन ,विचार

होली का शुभ मुहूर्त एवं मनाने की प्राचीन प्रक्रिया पर मार्गदर्शन ,विचार

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बिजनौर ।शेरकोट फाल्गुन पूर्णिमा के पावन अवसर पर होली पर्व के शुभ मुहूर्त और परंपरागत विधान को लेकर पंडित कृष्ण कुमार कौशिक (उमरपुर ,शेरकोट) ने श्रद्धालुओं को धर्मसम्मत विचार रखते हुए मार्गदर्शन प्रदान किया है।उन्होंने बताया कि प्रायः फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि में होलिका दहन तथा अगले दिन प्रातः प्रतिपदा को रंगोत्सव (धुरड्डी/वसंतोत्सव) मनाने का शास्त्रीय विधान है। समाज परंपरानुसार रंग, उल्लास और भाईचारे के साथ यह पर्व मनाता है किंतु इस वर्ष होलिका दहन और रंगोत्सव के मध्य चंद्रग्रहण पड़ने के कारण विशेष ज्योतिषीय परिस्थिति उत्पन्न हो रही है।पंचांग के अनुसार इस बार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा का आरंभ 2 मार्च सायं 5:55 बजे से होगा, जो 3 मार्च सायं 5.06 बजे तक रहेगी। होलिका दहन पूर्णिमा की रात्रि में ही किया जाता है। यदि पूर्णिमा दो दिन पड़ती है तो प्रदोष एवं रात्रि व्यापिनी पूर्णिमा में होलिका दहन का विधान माना गया है। उन्होंने बताया कि पूर्णिमा प्रारंभ होते ही भद्रा लग रही है। भद्रा में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं।किंतु ग्रंथों के अनुसार धर्मसिंधु ग्रंथ में उल्लेख है कि भद्रा के मुखकाल को त्यागकर उसके पुच्छकाल में होलिका दहन कर लेना चाहिए। अतः इस वर्ष 2 मार्च की रात्रि, अर्धरात्रि के पश्चात भद्रा के पुच्छकाल में होलिका दहन किया जाए। एवं 2 मार्च को अर्धरात्रि बाद भोर में लगभग 5.20 बजे भी होलिका दहन संभव है।जो सर्वथा उचित रहेगा।।रंगोत्सव को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया कि 3 मार्च सायंकाल 6:48 बजे तक चंद्रग्रहण रहेगा। चंद्रग्रहण का सूतक प्रातः लगभग 6:20 बजे से प्रारंभ हो जाएगा। सूतक काल में शुभ उत्सव नहीं मनाए जाते, केवल पूजा-पाठ किया जाता है। शास्त्रों में सूतक के दौरान रंग खेलने का स्पष्ट निषेध नहीं है, किंतु,उत्सव व् भोजन वर्जित माना गया है। चंद्रग्रहण के मोक्ष के पश्चात स्नान-दान करके भी रंगोत्सव मनाया जा सकता है, परंतु रात्रि की अपेक्षा दिन में उत्सव मनाना अधिक श्रेयस्कर है। इन सभी ज्योतिषीय एवं धार्मिक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए श्रद्धालुओं को परामर्श दिया गया है कि रंगोत्सव 4 मार्च को धर्मसम्मत रूप से मनाया जाए।अतः श्रद्धालुओं से आह्वान किया जा रहा है कि 2 मार्च की रात्रि में या अर्धरात्रि पश्चात भोर में होलिका दहन करें, 3 मार्च को सूतक काल में मर्यादा का पालन करें तथा 4 मार्च को हर्षोल्लास के साथ रंगोत्सव मनाएं। उन्होंने कहा कि धर्म की मर्यादा ही सनातन की शक्ति है।

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