पुरुषोत्तम क्षेत्र और निलचक्र
ब्रम्हपुराण कहता हैं कि जो कुरुक्षेत्र में अपनी इन्द्रियों और क्रोध को जीतकर बिना खाये-पीये सत्तर हजार वर्षों तक एक पैर पर खड़ा होकर तपस्या करता है तथा जो ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी को उपवासपूर्वक भगवान पुरुषोत्तम का दर्शन करता है, वह पहले की अपेक्षा अधिक फल का भागी होता है।
स्वर्गलोक की इच्छा रखनेवाले को चाहिये कि वें ज्येष्ठ मास में प्रयत्न करके इन्द्रिय-संयमपूर्वक भगवान पुरुषोत्तम का दर्शन करें। श्रेष्ठ मनुष्य को उचित है कि ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष की द्वादशी को विधिपूर्वक पञ्चतीर्थों का सेवन करके श्रीपुरुषोत्तम का दर्शन करे।
जो ज्येष्ठ द्वादशी को अविनाशी देवता भगवान पुरुषोत्तम का दर्शन करते हैं, वे विष्णुलोक में पहुँचकर कभी वहाँ से नीचे नहीं गिरते। अतः ज्येष्ठ में प्रयत्नपूर्वक वहाँ की यात्रा करनी चाहिये और वहाँ पञ्चतीर्थ का सेवन करके पुरुषोत्तम का दर्शन करना चाहिये।
जो बहुत दूर होने पर भी प्रतिदिन भक्तिपूर्वक भगवान पुरुषोत्तम का कीर्तन करता है, वह शुद्धचित्त हो भगवान विष्णु के धाम में जाता है।
जो श्रद्धापूर्वक एकाग्रचित्त होकर श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ यात्रा करता है, वह सब पापों से मुक्त हो भगवान विष्णु के लोक में जाता है। जो दूर से भगवान पुरुषोत्तम के प्रासाद और शिखरपर स्थित नीलचक्र का दर्शन करके उसे भक्तिपूर्वक प्रणाम करता है, वह मनुष्य सहसा पाप से मुक्त हो जाता है।
इस भाग में इतना ही।
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