समुद्र मार्जन और वटवृक्ष की पूजा
चतुर्दशी या पूर्णिमा को मार्कंडेयह्रद का स्नान करने से सब पाप नष्ट होकर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता हैं ऐसा ब्रम्हपुराण कहता हैं।
मार्कंडेयह्रद, अक्षयवट, श्रीकृष्ण-बलराम, समुद्र और इंद्रद्युम्न यह पुरुषोत्तम क्षेत्र के पाँच तीर्थ हैं।
जेष्ठ महीनें की पूर्णिमा को जब जेष्ठ नक्षत्र होता हैं तब विशेष रूप से तीर्थराज समुद्र की यात्रा करनी चाहिए।
एकाग्रचित्त होकर मन को और कहि भटकाये बिना मन, वाणी और शरीर से शुद्ध होकर भगवान में मन लगाना चाहिए।
समुद्र स्नान करके भगवान जनार्दन की तीन बार परिक्रमा करें।उनके दर्शन से सात जन्मों के पापों से छुटकारा मिल जाता हैं। प्रचुर और अभीष्ट गति प्राप्त होती हैं।
वटवृक्ष की जानकारी इस प्रकार बतलायी गई हैं। वटवृक्ष के नाम हर युग में अलग हैं। वट, वटेश्वर, कृष्ण और पुराणपुरुष यह चार युगों में वट के चार नाम हैं।
हर युग में इसका विस्तार अलग होता हैं। सत्ययुग में वटवृक्ष का विस्तार एक योजन होता हैं जो लगभग आठ मिल तक हो सकता हैं। त्रेता युग में पौन योजन याने लगभग छह मिल। द्वापर युग में आधा योजन मतलब चार मिल के आसपास और कलियुग में चौथाई योजन याने दो मिल के आसपास इसका विस्तार होता हैं।
यहाँ स्थित वटवृक्ष की तीन बार परिक्रमा करके वटवृक्ष मंत्र का उच्चारण करें।
वटवृक्ष का मंत्र इस प्रकार हैं:
ॐ नमोऽव्यक्तरूपाय महाप्रलयकारिणे।
महद्रसोपविष्टाय न्यग्रोधाय नमोऽस्तु ते॥
अमरस्त्वं सदा कल्पे हरेश्चायतनं वट।
न्यग्रोध हर मे पापं कल्पवृक्ष नमोऽस्तु ते॥
वटवृक्ष से थोड़ी थोड़ी दूरी पर स्वर्गद्वार हैं जहाँ भगवान विष्णु का दर्शन होता हैं। उस जगह समुद्री जल से आकृष्ट सर्वगुण संपन्न काष्ठ हैं, उसे प्रणाम करने पर संपूर्ण रोग और पापों का नाश होता हैं।
इस भाग में इतना ही।
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