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श्रीविष्णु अष्टाक्षर मंत्र ॐ नमो नारायण

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श्रीविष्णु अष्टाक्षर मंत्र ॐ नमो नारायण

श्रीविष्णु अष्टाक्षर मंत्र ॐ नमो नारायण

पिछले भाग में हमने समुद्र मार्जन और वटवृक्ष की पूजनविधि की जानकारी ली थी। उस पूजाविधि के पश्चात स्वर्गद्वार से निकलकर, विष्णुपूजा करने की पद्धति ब्रम्हपुराण में बतलायी गयी हैं।

लिखा हैं की, स्वर्गद्वार से समुद्र पर जाकर आचमन करें और पवित्र भाव से विष्णु अष्टाक्षर मंत्र ‘ॐ नमो नारायण’ मंत्र पाठ से अंगन्यास और करन्यास  करें। यह मंत्र सभी मनोरथों को पूर्ण करनेवाला हैं।

जल विष्णु का घर हैं अतः जल में स्नान करते समय विष्णु स्मरण करना चाहिए।

न्यास करना, मंत्र साधना से जुड़ा एक धार्मिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान होता है, जिसका अर्थ है मंत्रों के विशिष्ट अक्षरों या बीज-मंत्रों को शरीर के विभिन्न अंगों पर स्थापित करना, ताकि साधक अपने शरीर को एक मंदिर बनाकर दिव्यता का अनुभव कर सके और नकारात्मक शक्तियों को हटाकर चेतना को केंद्रित कर सके, यह अनुष्ठान शरीर में ऊर्जा के सही प्रवाह और देवता के आह्वान के लिए आवश्यक माना जाता है।

अंगन्यास और करन्यास करने के लिए

‘ॐ’ कार का बायें चरण में न्यास करें।

‘न’ कार का दायें चरण में न्यास करें।

‘मो’ कार का कटी के बायें भाग में न्यास करें।

‘ना’ कार काकटी के दायें भाग में न्यास करें।

‘रा’ कार का नाभि प्रदेश में न्यास करें।

‘य’ कार का बायी भुजा में न्यास करें।

‘णा’ कार का दायी भुजा में न्यास करें।

‘य’ कार का मस्तक पर न्यास करें।

इस तरह हाथ, पैर और कटी में ‘ॐ नमो नारायणाय’ मंत्र का न्यास करना हैं।

ऊपर-नीचे, आगे-पीछे, हॄदय में, पीठ की ओर श्रीनारायण का ध्यान करते हुए पुरुष कवच का पाठ करना चाहिए।

पुरुष कवच इस प्रकार हैं:

पूर्व में गोविंद, दक्षिण में मधुसूदन, पश्चिम में श्रीधर, उत्तर में केशव, आग्नेय में विष्णु, नैऋत्य में माधव, वायव्य में हृषिकेश, ईशान में वामन, नीचे वाराह और ऊपर त्रिविक्रम मेरी रक्षा करें।

इस प्रकार दसो दिशाओं में दस विष्णु नामों से पुरुष कवच का पाठ होता हैं।

इसके आगे के मंत्र और पूजा विधि अगले भाग में जानेंगे।

इस भाग में इतना ही।

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