अघमर्षण सूक्त तथा देवताओं और पितरों का आवाहन
श्रीविष्णु अष्टाक्षर मंत्र ॐ नमो नारायण मंत्रोच्चारण, पुरुष कवच मंत्रोच्चारण के बाद वैदिक मंत्रों से अभिषेक और मार्जन करके तीन बार अघमर्षण मंत्र का जप करना चाहिए। अश्वमेध यज्ञ की तरह अघमर्षण सूक्त सब पापों का नाश करनेवाला हैं। मंत्र का विधिवत उच्चारण करके स्नान ना करने से वह स्नान उत्तम नहीं माना जाता।
मंत्र इस प्रकार हैं:
त्वमग्निर्द्विपदां नाथ रेतोधाः कामदीपनः।
प्रधानः सर्वभूतानां जीवानां प्रभुरव्ययः॥
अमृतस्यारणिस्त्वं हि देवयोनिरपां पते।
वृजिनं हर मे सर्वं तीर्थराज नमोऽस्तु ते॥
स्नान के बाद जल से निकलकर दो निर्मल वस्त्र धारण करें। वस्त्र धारण के बाद प्राणायाम, आचमन एवं संध्योपासन करके ऊपर की ओर फूल और जल डालकर सूर्योपस्थान करें। सूर्योपस्थान करते समय दोनों भुजायें ऊपर की ओर उठायें रखें।
सूर्योपस्थान के बाद खड़े होकर गायत्री मंत्र और सूर्य मंत्रों का 108 बार जप करें।
इसके बाद सूर्य प्रदक्षिणा करके, उन्हें नमस्कार करके पूर्वाभिमुख होकर स्वाध्याय करें।
स्वाध्याय के बाद ऋषियों और पितरों का तर्पण करें। तिल मिश्रित जल से नाम-गोत्र का उच्चारण करते हुए पितरों की तृप्ति करें। पहले देवताओं का फिर पितरों का तर्पण करें।
श्राद्ध और हवन के समय एक हाथ से सभी वस्तुओं को अर्पित करना चाहिए। तर्पण करने के लिए दोनों हाथों से वस्तुओं को अर्पित करना चाहिए।
दोनों हाथों की अंजली बनाकर नाम और गोत्र का उच्चारण करते हुए ‘तृप्यताम’ बोलकर मौन भाव से जल देना चाहिए। तिल मिश्रित जल रुधिर के समान होता हैं। रुधिर मतलब रक्त। इसलिए अंगों पर स्थित तिलों से देवताओं और पितरों का तर्पण ना करें। उसे देनेवाला पाप का भागी होता हैं।
जल में स्थित होकर जमीन पर जल देना व्यर्थ होता हैं, वह किसी के पास नहीं पहुँचता। जमीन पर खड़े होकर जल में जल देना भी व्यर्थ होता हैं, वह भी किसी को नहीं मिलता। जमीन पर खडे होकर जमीन पर ही जल देना चाहिए।
अग्रभाग सहित पूर्वाग्र कुशों को बिछाकर उसपर से देवताओं का आवाहन करना चाहिए। पितरों का आवाहन करने के लिए कुशासन दक्षिणाग्र होना चाहिए।
इस तरह पूर्व दिशा में देवताओं का और दक्षिण दिशा में पितरों का आवाहन करना चाहिए।
यह संपूर्ण विधि बहुत बड़ी हैं इसलिए इसके आगे की विधि अगले भाग में जानेंगे। इस भाग में इतना ही।
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