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BNSS की धारा 346(2) | पहले से हिरासत में बंद आरोपी को 15 दिन से अधिक रिमांड अवैध नहीं : गुजरात हाइकोर्ट

गुजरात हाइकोर्ट ने कहा कि यदि कोई आरोपी पहले से न्यायिक हिरासत में है तो उसे 15 दिन से अधिक अवधि के लिए रिमांड पर रखना अवैध नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हैबियस कॉर्पस याचिका हर ऐसे मामले में स्वीकार्य नहीं होगी, जब तक यह न दिखाया जाए कि रिमांड आदेश पूरी तरह अवैध, अधिकार क्षेत्र से बाहर या यांत्रिक ढंग से पारित किया गया।

जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस डी.एम. व्यास की खंडपीठ दो जुड़ी हुई हैबियस कॉर्पस याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिन्हें विनोदभाई तिलकधारी तिवारी ने अपने पुत्रों की रिहाई के लिए दायर किया। उनके पुत्र भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और गुजरात पुलिस अधिनियम के तहत दर्ज एक आपराधिक मामले में न्यायिक हिरासत में हैं।

अदालत ने BNSS की धारा 346(2) और उसके प्रथम प्रावधान की शब्दावली में अंतर पर जोर देते हुए कहा कि यह अंतर ही विधायिका की मंशा को स्पष्ट करता है।

खंडपीठ ने कहा, “BNSS की धारा 346(2) ट्रायल को स्थगित या मुल्तवी करने की बात करती है, जिसके लिए कारण दर्ज करना आवश्यक है। प्रथम प्रावधान में अदालत को आरोपी को हिरासत में भेजने की शक्ति इसलिए दी गई, क्योंकि यह संभव है कि ट्रायल में देरी आरोपी के कारण हो रही हो।”

खंडपीठ ने आगे कहा कि यदि आरोपी जमानत पर रहते हुए ट्रायल को लंबा खींचने की कोशिश करे जैसे गवाहों की उपस्थिति प्रभावित करना तो सेशन कोर्ट को उसे हिरासत में लेने का अधिकार है ताकि ट्रायल निर्बाध और शीघ्र गति से चल सके।

अदालत ने स्पष्ट किया, “यदि आरोपी को ट्रायल स्थगित करते समय पहली बार हिरासत में लिया जाता है तो रिमांड की अवधि 15 दिन तक सीमित रहेगी। किंतु यदि आरोपी पहले से ही जमानत खारिज होने के कारण हिरासत में है तो उसकी निरंतर हिरासत पर 15 दिन की कोई समय-सीमा लागू नहीं होती।”

खंडपीठ ने यह भी कहा कि जांच चरण के दौरान 24 घंटे और अधिकतम 15 दिन की जो सीमा लागू होती है वही 15 दिन की अवधि प्रथम प्रावधान में परिलक्षित होती है।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यदि आरोपी पहले से हिरासत में है तो अदालत को केवल उसे पुनः हिरासत में भेजने के लिए वारंट जारी करना होता है। ऐसे में रिमांड की कोई अलग समय-सीमा निर्धारित करने का प्रश्न ही नहीं उठता।”

“यदि रिमांड पूर्णतः अवैध हो अधिकार क्षेत्र के बिना पारित किया गया हो या पूरी तरह यांत्रिक ढंग से दिया गया हो, तभी प्रभावित व्यक्ति हैबियस कॉर्पस का सहारा ले सकता है। अन्य परिस्थितियों में ऐसी याचिका स्वीकार्य नहीं होगी।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक अदालत द्वारा पारित रिमांड आदेश को परोक्ष रूप से हैबियस कॉर्पस के माध्यम से निरस्त नहीं किया जा सकता, जब तक यह सिद्ध न हो कि आदेश अनिवार्य कानूनी प्रावधानों की पूर्ण अवहेलना में पारित हुआ है।

मामले में आरोपियों को सितंबर और दिसंबर, 2024 में गिरफ्तार किया गया। उनकी नियमित जमानत याचिकाएं सेशन कोर्ट हाइकोर्ट और एक मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी खारिज की जा चुकी हैं। आरोप पत्र दाखिल होने और आरोप तय होने के बाद ट्रायल शुरू हुआ लेकिन पहले गवाह के बयान के बाद सेशन कोर्ट ने मामले को स्थगित करते हुए आरोपियों को 15 दिन से अधिक अवधि के लिए रिमांड पर भेज दिया।

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