गुंडिचा यात्रा
इस भाग में हम गुंडिचा यात्रा की जानकारी लेनेवाले हैं।
श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा रथ पर विराजमान होकर जब गुंडिचा यात्रा करते हैं तब उनका दर्शन करनेवाले विष्णुलोक में जाते हैं।
प्रबोधिनी एकादशी को, फाल्गुनी पूर्णिमा को तथा विषुव योग में विधिपूर्वक यह यात्रा क़रने से मनुष्य वैकुंठधाम में जाता हैं।
जेष्ठ मास में वहाँ की बारह यात्रा करनेवाले विविध भोगों का उपभोग करके मोक्ष प्राप्त करते हैं। बारह यात्राऐं पूरी होनेपर विधिपूर्वक उनकी प्रतिष्ठा करें।
जेष्ठ मास की एकादशी को एकाग्रचित्त होकर किसी पवित्र जलाशय पर जाकर आचमन करें और इंद्रियसंयम पूर्वक पवित्र भाव से भगवान नारायण का ध्यान करते हुए विधिवत स्नान करें। स्नान के पश्चात देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण करें।
इसके बाद गायत्री मंत्र का एक सौ आठ बार जप करें। इसके अलावा सूर्य मंत्र का जप करें, उनकी तीन बार परिक्रमा करें और प्रणाम करें।
इसके बाद मौन होकर घर मे जाये और हाथ पैर धोकर, आचमन करके श्रीपुरूषोत्तम की पूजा करें।
पहले घी से भगवान को स्नान कराये, फिर दूध से, दूध के बाद मधु, गंध और जल से, फिर तीर्थ चंदन और जल से स्नान कराये। स्नान के बाद उन्हें दो उत्तम वस्त्र पहनाये। इसके बाद चंदन, अगर, कपूर और केसर भगवान के अंगों में लगाये। कमल और मल्लिका जैसे विष्णु संबंधी फूलों से श्रीपुरूषोत्तम की पूजा करें। उनके सामने अगर, गूगल तथा अन्य सुगंधी पदार्थों से धूप जलाये। यथाशक्ति घी अथवा तिल के तेल के बारह दीपक जलाकर रखें।
नैवेद्य में खीर, पुआ, पूड़ी, बड़ा, लड्डू, खाँड और फल रखें। इस प्रकार पंचोपचार से श्रीपुरूषोत्तम की पूजा करके ॐ नमः पुरूषोत्तमाय इस मंत्र का एक सौ आठ बार जप करें।
इस के बाद निम्नलिखित प्रार्थना करें।
नमस्ते सर्वलोकेश भक्तानामभयप्रद।
संसारसागरे मग्नं त्राहि मां पुरुषोत्तम॥
यास्ते मया कृता यात्रा द्वादशैव जगत्पते।
प्रसादात्तव गोविन्द सम्पूर्णास्ता भवन्तु मे॥
प्रार्थना के बाद साष्टांग दंडवत करें। इसके बाद पुष्प, वस्त्र, चंदन आदि से गुरु की पूजा करें।
भगवान के ऊपर सुंदर पुष्प मंडप बनाये। श्रद्धा और एकाग्रता से रात्रि में जागरण करें। भगवान वासुदेव की कथा और गीत गायन करें।
जागरण करते हुए सुबह होने पर द्वादशी को बारह वेद-पुराण ज्ञाता, क्षोत्रिय और जितेंद्रिय ब्राम्हणों को निमंत्रित करें। खुद स्नान करें, भगवान को भी स्नान कराये। स्नान के बाद देवता और ब्राम्हणों की पूजा करें। उन्हें बारह गौएँ, सुवर्ण, छतरी, जूते और वस्त्र अर्पित करें।
आचार्यों को गौ, वस्त्र, सुवर्ण, छतरी, जूते और काश्य पात्र अर्पित करें।
ब्राम्हणों को खीर, पक्वान, गुड़ और घी में बने पदार्थ भोजन कराये। भोजन के पश्चात लड्डू, यथाशक्ति दक्षिणा और जल से भरें बारह घड़े दान करें।
इसके बाद निम्नलिखित मंत्र पढ़े।
सर्वव्यापी जगन्नाथः शङ्खचक्रगदाधरः।
अनादिनिधनो देवः प्रीयतां पुरुषोत्तमः॥
मंत्र पाठ के बाद तीन बार ब्राम्हणों की प्रदक्षिणा करें। मस्तक झुकाकर आचार्यों को भक्तिभाव से प्रणाम करें। आचार्यों को विदा करके, ब्राम्हणों को भी गाँव की सीमा तक पहुँचा दे। अंत में सब को नमस्कार करके लौट आये।
फिर स्वजनों, बांधवों, उपासकों, दिन दुखियों, भिखारियों और अन्न चाहनेवालों को भोजन कराकर खुद भी मौन होकर भोजन करें।
इस प्रकार एक हजार यज्ञों का और सौ राजसूय यज्ञों का फल मिलता हैं। इच्छा अनुसार चलनेवाले विमान से विष्णु लोक प्राप्त होता हैं।
इस भाग में इतना ही।
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