धुंधुवध की कथा
ब्रह्मपुराण ग्रंथ अनुसार नैमिषारण्य में उपस्थित ऋषियोंने लोमहर्षण जी से कहा हमें धुंधुवध की कथा विस्तार से सुनाईये।
उनके कहने पर सूतजी ने कथा आरंभ की।
कुवलाश्व के सौ पुत्र थे। वे सभी अच्छे धनुर्धर, विद्याप्रवीण, बलवान और अपराजित थे। वे सभी धर्मनिष्ठ और दानी थे।
राजा बृहदश्वने कुवलाश्व को राजगद्दी देकर तपस्या हेतु वानप्रस्थ होने का सोचा।
उन्हें जाता देख ब्रम्हर्षि उतंक ने उन्हें रोकते हुए कहा ‘मेरे आश्रम के करीब मधु नाम का राक्षस पुत्र धुंधु रहता हैं। वह संपूर्ण लोकों का संहार करने के लिए कठोर तपस्या करता हैं और बालू के भीतर रहता हैं। वर्ष में एक बार वह बड़े जोर से साँस लेता हैं। उसके श्वास की हवा से बड़े जोर की धूल उड़ती हैं और सूर्य की रोशनी को ढँक लेती हैं। लगातार सात दिनों तक भूकंप होते रहते हैं। इसलिए वहाँ रहना मुश्किल हो रहा हैं। आप लोकहित के लिए उस दैत्य को मार दीजिए।’
बृहदश्वने कहा ‘मैंने अस्त्र शस्त्रों का त्याग किया हैं, यह मेरा पुत्र धुंधु का वध करेगा।’
बृहदश्वने कुवलाश्व को धुंधुवध करने की आज्ञा दी और खुद तपस्या करने चले गये।
कुवलाश्व अपने पुत्रों संग उतंक के संग चले गए। उतंक के अनुरोध से संपूर्ण लोकों का हित करने के लिए भगवान विष्णुने कुवलाश्व के शरीर में प्रविष्ट किया।
कुवलाश्व ने पुत्रों को साथ ले समुद्र को खुदवाया। खुदाई करके उन्होंने बालू के भीतर धुंधु का पता लगाया। वह पश्चिम दिशा को घेरकर पड़ा था। वह (1.अ. जा.) मुखाग्नि से लोक संहार जलस्त्रोत बहाने लगा। जैसे चंद्रोदय के समय समुद्र में ज्वार आकर लहरें तेज होती हैं वैसे ही जल का वेग बढ़ने लगा। कुवलाश्व के तीन पुत्र छोड़कर बाकी सब धुंधु की मुखाग्नि से जलकर भस्म हो गये। उसके बाद कुवलाश्व ने धुंधु पर आक्रमण किया। कुवलाश्व योगी थे इसलिए उन्होंने योगशक्ति से वेग से प्रवाहित होनेवाले जल को पी लिया और आग को बुझा दिया। फिर अपने बल से धुंधु को मार दिया।
कुवलाश्व के पराक्रम से खुश होकर उतंक ऋषि ने उन्हें वर दिया के ‘तुम्हारा धन अक्षय होगा, तुम अपराजित रहोगे, तुम सदा धर्मप्रेमी रहोगे, तुम्हे अक्षय स्वर्गलोक प्राप्त होगा, राक्षस द्वारा मारे गये तुम्हारे पुत्रों को स्वर्ग में अक्षयलोक प्राप्त होगा।’
अधिक जानकारी
1. मुखाग्नि – धुंधु और धुंधुवध का वर्णन पढ़कर लगता हैं जैसे समुद्र में ज्वालामुखी फट रहा हो। या भूमि या रेत के अंदर कोई भूकंप जैसी बड़ी हलचल हो रही हो।
जब समुद्र में ज्वालामुखी फटता हैं तब आमतौर पर लावा और राख समुद्र में गिरती है, जिससे सुनामी और भूकम्प जैसी घटनाएं हो सकती हैं। ज्वालामुखी के आसपास के समुद्री क्षेत्र में नई भूमि और द्वीप बन सकते हैं, और कुछ मामलों में समुद्र का रंग भी बदल सकता है। जब लावा समुद्र में प्रवेश करता है, तो यह तुरंत ठंडा हो जाता है और ठोस बन जाता है। इस प्रक्रिया में, पानी भाप में बदल जाता है और थर्मल शॉक के कारण लावा के आसपास एक धुआंधार बादल बनता है ( कहानी में सूर्य की रोशनी ढकने की बात लिखी गयी हैं।)। पानी दूषित होता हैं।
बालू के अंदर रहनेवाले जानवरों की बात करें तो रेगिस्तान में 1.8 मीटर का रेगिस्तानी चूहा और 2 मीटर के करीब याने पाँच-छह फीट के आसपास की मॉनिटर छिपकली पायी जाती हैं।
धुंधु पश्चिम दिशा को घेरकर पड़ा था ऐसा लिखा गया हैं। पश्चिमी रेगिस्तान सहारा का एक क्षेत्र है जो नील नदी के पश्चिम में लीबिया की सीमा तक और भूमध्य सागर से दक्षिण में सूडान की सीमा तक स्थित है।
भूमध्य सागर के सक्रिय ज्वालामुखी दो चाप संरचनाओं के साथ वितरित हैं: एजियन सागर में हेलेनिक चाप और टायरहेनियन सागर में कैलाब्रियन चाप।
दोनों चापों में सक्रिय ज्वालामुखी 100 किमी से अधिक गहराई वाले भूकंपों के ऊपर स्थित हैं।
थार रेगिस्तान, जिसे ग्रेट इंडियन डेजर्ट के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग में एक शुष्क क्षेत्र है जो भारत और पाकिस्तान में 200,000 किमी (77,000 वर्ग मील) के क्षेत्र में फैला हुआ है। वहाँ भी कोई बड़ा जानवर हैं तो नहीं। पर दिशा पश्चिम की ही हैं और थार के पोखरण में 1974 में भारत के परमाणु हथियार का पहला भूमिगत परीक्षण हुआ था।
इस भाग में इतना ही।
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