इंद्रद्युम्न तीर्थ और श्री पुरुषोत्तम तीर्थ
पुरुषोत्तम की पूजा करके समुद्र की प्रार्थना करें। फिर इंद्रद्युम्न तीर्थ पर आये। यह तीर्थ अश्वमेध यज्ञ के अंग से उत्पन्न हुआ हैं।
जल में उतरते हुए निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करें।
मंत्र इस प्रकार हैं:
अश्वमेधाङ्गसम्भूत तीर्थ सर्वाधनाशन।
खानं त्वयि करोम्यद्य पापं हर नमोऽस्तु ते॥
मंत्र उच्चारण और स्नान करके, देवता, ऋषि, पितरों और अन्य लोगों का तर्पण करने से दस अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता हैं। विष्णुलोक की प्राप्ति होती हैं।
ब्रह्मपुराण के अनुसार जेष्ठ मास में शुक्ल पक्ष की दशमी को दस पापों का हरण होता हैं इसलिए इसे दशहरा कहा जाता हैं।
जेष्ठ मास में, शुक्ल पक्ष की दशमी से लेकर पूर्णिमा तक पृथ्वी पर स्थित सभी तीर्थ पुरुषोत्तम तीर्थ में जाकर रहते हैं। इसलिए उस समय वहाँ किया जानेवाला स्नान, दान, देवदर्शन, देवपूजन और पुण्यकर्म अक्षय होता हैं।
उत्तरायण और दक्षिणायण के आरंभ के दिन श्रीपुरुषोत्तम, बलराम और सुभद्रा का दर्शन करनेवाला वैकुंठधाम जाता हैं।
फाल्गुन की पूर्णिमा को श्रीगोविंद को झुलेपर विराजमान देखनेवाला उन्हीं के धाम में जाता हैं।
विषुव योग के दिन जो पंचतीर्थ विधि का पालन करके श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा का दर्शन करता हैं वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक में जाता हैं।
वैशाख कृष्ण तृतीया को चंदन चर्चित श्रीकृष्ण का दर्शन करनेवाला विष्णुधाम में जाता हैं।
जेष्ठा नक्षत्र से युक्त पूर्णिमा के दिन श्रीपुरुषोत्तम का दर्शन करनेवाला अपनी इक्कीस पीढयों का उद्धार करके श्रीविष्णु लोक में जाता हैं।
जिस दिन राशि और नक्षत्र के योग से महाजेष्ठी हो याने जेष्ठ की पूर्णिमा हो उस दिन यत्नपूर्वक श्रीपुरुषोत्तम तीर्थ में पहुँचना चाहिए।
महाजेष्ठी पर्व के दिन श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा का दर्शन करनेवाला बारह यात्राओं से भी अधिक फल पाता हैं। वह अपने समस्त कुल का उद्धार करता हैं।
इस भाग में इतना ही।
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