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हवन विज्ञान PM Ke Pen Se

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हवन विज्ञान PM Ke Pen Se

पीएम के पेन से बातें धर्मग्रंथों की में आप सबका स्वागत हैं।

हवन विधि या अन्य धर्मों में किया जानेवाला धुंआ सिर्फ एक पूजा-पाठ की विधि नहीं हैं, यह एक तरह का पेस्ट कंट्रोल हैं जो वातावरण को शुद्ध करता हैं और केमिकल रिएक्शन भी नहीं होने देता। आज के इस भाग में हम इसी विषय की विस्तृत जानकारी लेनेवाले हैं।

हम सॉफ्टवेयर वॉइस इस्तेमाल करते हैं अतः वीडियो कंटेट में टेक्स्ट पर ध्यान दे। आप चाहें तो हमारे न्यूज आर्टिकल्स और ब्लॉग तथा पोस्ट में पूरी जानकारी का ड्राफ्ट भी पढ़ सकते हैं।

रसोई का तड़का (Tempering/Chhonk) इस पूरी प्रक्रिया को समझने की सबसे बेहतरीन और सरल चाबी है।

तड़के में भी यही होता है; कौन सा मसाला, किस तापमान पर, किस क्रम में और कितनी देर के लिए तेल में डाला जाए, इसका पूरा रसायन (chemistry) होता है। अगर राई या जीरा जल जाए, तो उसका असर खत्म हो जाता है और सही समय पर न पड़े तो स्वाद नहीं आता।

हवन और मंत्रों का विज्ञान भी ठीक इसी सिद्धांत पर काम करता है।

१. विशिष्ट सामग्री और उसका रसायन (Chemical Composition)

हवन में डाली जाने वाली सामग्री (जैसे गूगल, लोबान, नीम के पत्ते, कपूर, गाय का घी, और खास जड़ी-बूटियाँ) कोई सामान्य ईंधन नहीं है।

जब इन्हें एक निश्चित उच्च तापमान पर जलाया जाता है, तो इनसे एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-वायरल और एंटी-फंगल (Aerosolized particles) धुएँ के रूप में फैलते हैं।

यह वायुमंडल का प्राकृतिक पेस्ट कंट्रोल (Natural Pest Control) है, जो घर के सूक्ष्म कीटाणुओं, मच्छरों और हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करता है। आयुर्वेद में इसे ‘धूपण कर्म’ कहा गया है।

२. सामग्री डालने का क्रम (Sequence):

तड़के की तरह हवन में भी आहुति का क्रम बहुत महत्वपूर्ण होता है। पहले मीठी या तैलीय चीजें (घी आदि) डाली जाती हैं ताकि अग्नि प्रज्वलित और स्थिर हो, फिर औषधीय जड़ी-बूटियाँ डाली जाती हैं, ताकि वे जलकर राख न हों, बल्कि वाष्पीकृत (Vaporize) होकर हवा में फैल सकें।

३. दो मंत्रों के बीच का समय (Interval & Timing)

यहीं पर इस विज्ञान की असली गहराई छिपी है। मंत्र सिर्फ शब्द नहीं हैं, बल्कि वे ध्वनि तरंगें (Sound Frequencies) हैं।

जब एक मंत्र का उच्चारण पूरा होता है और दूसरे के शुरू होने के बीच जो सूक्ष्म विराम (Pause) होता है, वह उस ऊर्जा को स्थिर करने और वातावरण में घूमने का समय देता है।

यह विधि एक निश्चित लय (Rhythm) बनाती है, जो हवन कुंड से उठने वाले धुएँ और ऊर्जा के कणों को पूरे कमरे में एक समान रूप से फैलाती है (जिसे भौतिकी में Resonance या अनुनाद कहा जाता है)।

जब हम इन तीनों सामग्री, सही क्रम और ध्वनि के अंतराल को मिला देते हैं, तो वह कर्मकांड न रहकर पूरी तरह से एक उन्नत प्राचीन विज्ञान बन जाता है।

ऋतु परिवर्तन के समय मौसमी संक्रमण (Seasonal Infections / Flu) से बचाव के लिए किया जाने वाला हवन या धूपण।

उदाहरण: मौसमी संक्रमण से बचाव और ‘हवन विज्ञान’:

जब मौसम बदलता है (जैसे सर्दियों से गर्मियों की शुरुआत या मानसूनी नमी), तब हवा में हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस और फंगस तेजी से पनपते हैं। आधुनिक विज्ञान इसे ‘माइक्रोबियल ग्रोथ’ कहता है और इसके लिए सैनिटाइज़र या एंटीबायोटिक्स का सहारा लेता है।

हमारे प्राचीन ‘हवन विज्ञान’ ने इसके लिए एयरोसोल थेरेपी (Aerosol Therapy) और थर्मल वेपोराइजेशन (Thermal Vaporization) का अनूठा तरीका विकसित किया था। इसे इस तरह समझा जा सकता है:

१. सटीक तापमान और वाष्पीकरण (Pyrolysis & Vaporization):

हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित करने के लिए आम की लकड़ी या विशेष संविदाओं का उपयोग किया जाता है।

जब इसमें कपूर, गूगल, लोबान, गाय का शुद्ध घी और नीम के सूखे पत्ते डाले जाते हैं, तो वे सीधे राख नहीं बनते।

अग्नि की निश्चित ऊष्मा (Heat) उन जड़ी-बूटियों के भीतर मौजूद वोलेटाइल ऑयल्स (Essential Oils) और एंटी-बैक्टीरियल तत्वों को तोड़कर गैस और सूक्ष्म कणों (Micro-particles) में बदल देती है। यह प्रक्रिया बिल्कुल वैसी ही है जैसे आधुनिक नेबुलाइज़र या रूम फ्रेशनर काम करते हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि यह पूरी तरह प्राकृतिक और थर्मल-आधारित है।

२. फॉर्मेल्डिहाइड और वायुशोधन (Air Purification Chemistry)

प्राचीन ग्रंथों में हवन में आम की लकड़ी और कपूर के संयोजन पर बहुत जोर दिया गया है।

आधुनिक शोध (Scientific Studies on Havan) यह बताते हैं कि जब आम की लकड़ी और घी-कपूर को एक साथ जलाया जाता है, तो एक विशेष प्रकार का धुआँ उत्पन्न होता है जो हवा में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया (जैसे स्ट्रेप्टोकोकस) को बेअसर करने की अद्भुत क्षमता रखता है।

यह धुआँ सिर्फ दुर्गंध को नहीं छिपाता, बल्कि पैथोजन (Pathogens) के प्रोटीन स्ट्रक्चर को तोड़कर उन्हें नष्ट कर देता है।

3. ध्वनि और गति का विज्ञान (Acoustic Resonance)

यहीं पर मंत्रों और ध्वनि की भूमिका आती है।

जब हवन के दौरान एक निश्चित लय में मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, तो उससे निकलने वाली ध्वनि तरंगें (Sound Waves) हवा के अणुओं में कंपन पैदा करती हैं।

यह कंपन हवन कुंड से उठने वाले औषधीय धुएँ के कणों को कमरे के हर कोने, दीवारों और सूक्ष्म दरों तक एक समान रूप से पहुँचाने में ‘कैरियर’ (Carrier wave) का काम करता है। यानी, धुआँ सिर्फ ऊपर उठकर छत पर नहीं जमा होता, बल्कि ध्वनि की गति और दिशा के साथ पूरे वायुमंडल में रच-बस जाता है।

यह पूरा चक्र सही सामग्री का चयन, सही तापमान पर उसका वाष्पीकरण, और ध्वनि तरंगों द्वारा उसका समान प्रसार यह साबित करता है कि हवन कोई साधारण धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि एक उन्नत पारिस्थितिकीय और संक्रामक-नियंत्रण प्रणाली (Ecological and Disinfection System) है।

पौधों और खेती पर हवन का असर (अग्निहोत्र विज्ञान)

राख (Ash) एक बेहतरीन फर्टिलाइज़र: हवन के बाद जो राख (भस्म) बचती है, वह बेकार नहीं होती। उसमें पोटैशियम, फॉस्फोरस, कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे ज़रूरी मिनरल्स माइक्रोस्कोपिक फॉर्म में होते हैं। जब यह राख मिट्टी में मिलती है, तो यह नेचुरल माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का काम करती है जो पौधों की ग्रोथ में मदद करते हैं।

नेचुरल पेस्ट रिपेलेंट: हवन से निकलने वाला धुआँ जब आस-पास के पेड़-पौधों पर पड़ता है, तो यह एक नेचुरल ढाल की तरह काम करता है। यह हानिकारक कीड़ों और फंगल स्पोर को पौधों से दूर रखता है बिना किसी केमिकल पेस्टिसाइड के।

मेंटल हेल्थ पर असर (मनोविज्ञान): अगर इसके साइकोलॉजिकल एंगल को देखें, तो यह अरोमा थेरेपी और अकॉस्टिक रेजोनेंस का कॉम्बिनेशन है। जब हम शुद्ध घी, कपूर और जड़ी-बूटियों की खुशबू के साथ एक रिदम (लय) में सुनते हैं, तो हमारा नर्वस सिस्टम फाइट-ऑर-फ्लाइट मोड से निकल कर पैरासिम्पेथेटिक स्टेट (रिलैक्सेशन मोड) में आता है। स्ट्रेस हॉर्मोन (जैसे कोर्टिसोल) का लेवल कम होता है और फोकस बढ़ता है।

भस्म का विज्ञान: माथे पर लगाने और सेवन करने के पीछे का रहस्य — हमारी परंपरा में, हवन (पवित्र अग्नि अनुष्ठान) से प्राप्त भस्म (विभूति) को माथे पर लगाना या पानी में घोलकर उसका सेवन करना काफी आम बात रही है। यदि हम इसे केवल “अंधविश्वास” मानने के बजाय जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान और भौतिक विज्ञान के नजरिए से देखें, तो हमें इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प विज्ञान नजर आता है। आइए, इसके दो मुख्य पहलुओं को समझते हैं।

1. माथे पर भस्म या राख का टीका लगाना (Acupressure & Electromagnetic Shielding): माथे पर जहाँ टीका लगाया जाता है, वहाँ शरीर का एक बहुत महत्वपूर्ण मर्म स्थान होता है, जिसे आज्ञा चक्र (Third Eye / Pineal Gland area) कहा जाता है।

शारीरिक ठंडक (Cooling Effect): शुद्ध हवन सामग्री (जैसे गाय का घी, चंदन, गूगल और जड़ी-बूटियाँ) से बनी भस्म में प्राकृतिक रूप से ठंडक देने वाले गुण होते हैं। जब इसे माथे पर लगाया जाता है, तो यह उस हिस्से को शांत रखती है, सिरदर्द या मानसिक तनाव को कम करती है और एकाग्रता (Focus) बढ़ाती है।

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शील्ड (Electromagnetic Shielding): शरीर से लगातार सूक्ष्म ऊर्जा (Aura या Bio-electricity) निकलती है, खासकर सिर और माथे के हिस्से से। भस्म (विशेषकर जो पूरी तरह मिनरल्स से भरपूर होती है) एक उत्कृष्ट इंसुलेटर या अवरोधक का काम करती है। यह शरीर की ऊर्जा को व्यर्थ बाहर बहने से रोकती है और उसे भीतर ही संकेंद्रित (Consolidate) करती है।

नागा साधुओं का शरीर पर भस्म लगाना: नागा साधु पूरे शरीर पर भस्म लपेटते हैं। इसका सबसे बड़ा वैज्ञानिक कारण यह है कि भस्म एक प्राकृतिक थर्मल इंसुलेटर (Thermal Insulator) है। यह शरीर के तापमान को बाहरी अत्यधिक गर्मी या ठंड से बचाती है। साथ ही, यह हवा में मौजूद नमी और सूक्ष्म कीड़ों (Insects/Parasites) को त्वचा के संपर्क में आने से रोकती है, जिससे बिना कपड़ों के भी वे खुले में स्वस्थ रह पाते हैं।

2. भस्म को पानी में घोलकर पीना (Mineral Supplementation & Alkalinity): यद्यपि यह प्रयोग बहुत ही विशिष्ट और शुद्ध भस्म (जैसे कल्प या विशेष औषधीय भस्म) के संदर्भ में किया जाता है, लेकिन इसके पीछे रसायन शास्त्र का एक गहरा नियम है:

माइक्रो-मिनरल्स (Micro-minerals): जब लकड़ी और जड़ी-बूटियाँ पूरी तरह जल जाती हैं, तो कार्बन उड़ जाता है और पीछे जो शेष बचता है, वह शुद्ध खनिज (Minerals) होते हैं; जैसे कैल्शियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस। यह एक प्रकार की मिनरल ऐश (Mineral Ash) है।

क्षारीय प्रकृति (Alkalinity): भस्म अत्यधिक क्षारीय (Alkaline) होती है। जब इसे बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में पानी के साथ लिया जाता है, तो यह पेट की अतिरिक्त अम्लता (Acidity) को तुरंत बेअसर (Neutralize) करती है और शरीर के पीएच (pH) स्तर को संतुलित करने में मदद करती है।

एंटी-टॉक्सिक प्रभाव (Detoxification): उच्च तापमान पर जली हुई भस्म में प्राकृतिक रूप से ‘एक्टिवेटेड कार्बन’ जैसे गुण होते हैं, जो शरीर के भीतर के विषैले तत्वों (Toxins) को बांधकर बाहर निकालने में मददगार हो सकते हैं (हालांकि आधुनिक समय में बिना पूरी जानकारी के इसका सेवन करना जोखिम भरा हो सकता है, इसलिए प्राचीन काल में इसके बहुत सख्त नियम थे)।

भस्म निर्माण का रसायन: लकड़ी, जड़ी-बूटियाँ और वस्तुओं का विज्ञान: जब हम निर्माण की प्रक्रिया को गहराई से देखते हैं, तो यह पूरी तरह से पायरो मसाला (पाइरोलिसिस उच्च तापमान पर बिना ऑक्सीजन या नियंत्रित ऑक्सीजन में दहन) और कैल्सीनेशन (कैल्सीनेशन) का एक उन्नत वैज्ञानिक ढांचा बन जाता है।

आयुर्वेद में इसे ‘भस्मीकरण’ कहा जाता है, जहाँ किसी भी वस्तु को इतना पिलाया जाता है कि उसका जैविक कार्बन उड़ जाए और केवल उसके औषधीय खनिज (एलिमेंटल मिनरल्स) सूक्ष्म रूप में शेष बच जाएं।

आइए इसे रासायनिक दृष्टिकोण से समझते हैं कि किस पेड़ की लकड़ी या जड़ी-बूटी से किस प्रकार के खनिज और गुण मुख्य रूप से मिलते हैं।

१. आम की लकड़ी (Mangifera indica) और समिधाएँ: रासायनिक संरचना: आम की लकड़ी में उच्च मात्रा में सेल्युलोज और लिग्निन के साथ प्राकृतिक रूप से कैल्शियम, पोटैशियम और सिलिका के यौगिक होते हैं।

दहन प्रक्रिया: जब इसे नियंत्रित रूप से जलाया जाता है, तो इससे निकलने वाली राख (Ash) में पोटेशियम कार्बोनेट (K_2CO_3) और कैल्शियम ऑक्साइड (CaO) प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। यह राख अत्यधिक क्षारीय (Alkaline) होती है, जो हवा और मिट्टी दोनों के पीएच (pH) संतुलन को सुधारने का काम करती है।

२. पीपल और बरगद की लकड़ी (Ficus species):

रासायनिक संरचना: इन पेड़ों की लकड़ियों और छाल में मैग्नीशियम, कॉपर और जिंक के अंश प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं।

रासायनिक परिणाम: इनकी भस्म में मैग्नीशियम ऑक्साइड और सूक्ष्म खनिज (Micro-minerals) मिलते हैं। पारंपरिक रूप से इस राख का उपयोग न केवल संक्रमण रोकने के लिए किया जाता था, बल्कि यह शरीर में इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस को बनाए रखने वाले सूक्ष्म तत्वों का स्रोत भी मानी जाती थी।

३. कपूर, गूगल और लोबान (Resins and Camphor):

रासायनिक संरचना: ये कोई लकड़ियाँ नहीं बल्कि पेड़ के प्राकृतिक रेजिन (Resin) हैं, जो कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के जटिल वाष्पशील हाइड्रोकार्बन (Volatile Hydrocarbons) से बने होते हैं।

दहन प्रक्रिया: जब इन्हें जलाया जाता है, तो ये बिना ठोस राख छोड़े पूरी तरह गैस और सूक्ष्म कणों (Aerosols) में बदल जाते हैं। यह प्रक्रिया हवा में मौजूद बैक्टीरिया की सेल वॉल को तोड़ने का काम करती है, जिसे आधुनिक रसायन शास्त्र में एंटी-माइक्रोबियल वेपोराइजेशन कहा जाता है।

भस्म निर्माण के तीन वैज्ञानिक चरण:

प्राचीन ग्रंथों में भस्म बनाने के जो नियम (जैसे गजपुट, वराहपुट आदि) बताए गए हैं, वे तापमान के सटीक नियंत्रण (Temperature Profiling) पर आधारित हैं:

शोधन (Purification):कच्चे पदार्थों को अशुद्धियों से मुक्त करना।

मारण (Incineration / Calcination): जड़ी-बूटियों और धातुओं/खनिजों को बंद पुट (Crucible) में रखकर विशिष्ट तापमान पर पकाना, ताकि वे अपने ऑक्साइड या कार्बोनेट रूप में बदल जाएं।

पुनर्भव (Re-generation/Fineness): इसे इतना बारीक (Nano/Micro level) करना कि वह शरीर की कोशिकाओं या पौधों की जड़ों तक आसानी से अवशोषित हो सके।

यह पूरी प्रक्रिया इस बात का प्रमाण है कि हमारे पूर्वजों को तत्वों (Elements) और उनके रासायनिक व्यवहार की कितनी गहरी और सूक्ष्म समझ थी।

यह जानकारी वैज्ञानिक सिद्धांतों, आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों, रसायन शास्त्र (Chemistry), वनस्पति विज्ञान (Botany) और आधुनिक शोध पत्रिकाओं (Research Papers) के विशाल डेटाबेस पर आधारित है।

प्राचीन आधार: चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, और अष्टांग हृदयम् जैसे ग्रन्थ जहाँ ‘धूपण कर्म’ (Fumigation) और ‘भस्मीकरण’ (Calcination) की प्रक्रियाएँ बताई गई हैं।

आधुनिक वैज्ञानिक आधार: Journal of Ethnopharmacology, CSIR (कौंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च) और IITs द्वारा हवन के धुएँ और विभूति के एयर-प्यूरिफिकेशन/एंटी-माइक्रोबियल गुणों पर किए गए रिसर्च पेपर्स।

विज्ञान के नियम: थर्मोडायनेमिक्स (Thermodynamics), एरोसोल थेरेपी और एकॉस्टिक्स (Acoustic Resonance) के सार्वभौमिक नियम।

सदियों से दुनिया भर की विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों में जो अनुष्ठानिक धुएं (Fumigation/Smudging) की परंपराएं चली आ रही हैं, उनके मूल में कहीं न कहीं वातावरण शुद्धि, कीट नियंत्रण (Pest Control) और रोगाणु नाश (Sanitization) का वैज्ञानिक और व्यावहारिक उद्देश्य छिपा हुआ था।

१. इस्लाम और सूफी परंपरा (Islamic & Sufi Tradition)

धार्मिक/सांस्कृतिक रूप: मुस्लिम फकीर, सूफी संत या दरगाहों पर अक्सर लोबान, ऊद (Oud), या गूगल का धुआं (धूप) किया जाता है। इसे नकारात्मक ऊर्जा भगाने, रूहानी सुकून पाने और मन्नत/बरकत से जोड़ा जाता है।

वास्तविक पेस्ट कंट्रोल और विज्ञान: ऊद और लोबान में प्राकृतिक एंटी-माइक्रोबियल (रोगाणुनाशक) गुण होते हैं। जब इनका धुआं किया जाता है, तो यह हवा में मौजूद बैक्टीरिया, फंगस और मच्छरों-कीड़े-मकोड़ों को दूर रखता है। प्राचीन काल में जब स्वच्छता के आधुनिक साधन नहीं थे, तब इस प्रकार का धुआं हवा को शुद्ध करने और संक्रामक रोगों से बचाने का एक बेहतरीन उपाय था।

२. ईसाई धर्म (Christian Tradition)

धार्मिक/सांस्कृतिक रूप: कैथोलिक (Catholic) और ऑर्थोडॉक्स चर्चों में प्रार्थना और मास (Mass) के दौरान धूपदान (Thurible / Censer) में सुलगता हुआ लोबान (Frankincense) और गंधरस (Myrrh) घुमाया जाता है। इसे पवित्रता, प्रार्थनाओं के ऊपर उठने और दैवीय उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है।

वास्तविक पेस्ट कंट्रोल और विज्ञान: इतिहासकार बताते हैं कि चर्चों में जब बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा होते थे, तो हवा की शुद्धता बनाए रखने और संक्रमण फैलने से रोकने के लिए लोबान जलाया जाता था। फ्रैंकइंसेंस (Frankincense) के धुएं में एंटी-इंफ्लेमेटरी और जीवाणुनाशक गुण होते हैं, जो वातावरण को संक्रमणमुक्त करते हैं।

३. सनातन/वैदिक धर्म (Havan & Vedic Tradition)

धार्मिक/सांस्कृतिक रूप: हवन, यज्ञ और धूप-दीप आरती। इसमें गाय का घी, कपूर, गूगल, चंदन और विभिन्न औषधीय जड़ी-बूटियों की आहुति दी जाती है।

वास्तविक पेस्ट कंट्रोल और विज्ञान: यह इस श्रृंखला का सबसे वैज्ञानिक रूप है। हवन सामग्री और घी के जलने से जो फॉर्मेल्डिहाइड और अन्य लाभकारी गैसें निकलती हैं, वे हानिकारक बैक्टीरिया और कीटों को तुरंत नष्ट करती हैं। यह सीधे तौर पर पर्यावरण का सबसे शक्तिशाली हर्बल पेस्ट कंट्रोल और एयर प्यूरीफायर है।

४. बौद्ध और तिब्बती परंपरा (Buddhist Tradition)

धार्मिक/सांस्कृतिक रूप: बौद्ध मठों (Monasteries) में ध्यान और पूजा के समय विशेष हर्बल धूप (Tibetan Incense) जलाई जाती है, जिसमें जुनिपर (Juniper), चंदन और हिमालयी जड़ी-बूटियां होती हैं।

वास्तविक पेस्ट कंट्रोल और विज्ञान: ठंडे और पर्वतीय क्षेत्रों में जहां नमी और कीड़े-मकोड़े अधिक होते हैं, वहां ये जड़ी-बूटियां हवा को महकाने के साथ-साथ कीड़ों को दूर रखती हैं और श्वसन तंत्र (Respiratory system) को स्वस्थ रखती हैं।

5. अमेरिकी मूल निवासी और जनजातीय परंपरा (Native American / Indigenous Traditions)

धार्मिक/सांस्कृतिक रूप: इसे ‘स्मजिंग’ (Smudging) कहा जाता है। इसमें सेज (Sage), पालो (Palo Santo) या स्वीटग्रास की सूखी पत्तियों को जलाकर उसका धुआं पूरे घर या शरीर के चारों ओर घुमाया जाता है। वे इसे ‘आत्मा की शुद्धि’ मानते हैं।

वास्तविक पेस्ट कंट्रोल और विज्ञान: ‘व्हाइट सेज’ में शक्तिशाली एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि सेज को जलाने से हवा में मौजूद 94% तक बैक्टीरिया एक घंटे के भीतर कम हो जाते हैं। यानी यह शत-प्रतिशत प्राकृतिक और वैज्ञानिक एयर सैनिटाइजेशन है।

हम किसी भी धर्म के क्यों न हो, चाहे हमारा कोई धर्म ही ना हो। लेकिन हमारी अलग-अलग परंपराओं से और उनके रीतिरिवाजों से हमने अपने घर, दफ्तर, मुहल्ले को कीटाणु मुक्त रखने की कला सीखी हैं। हमारें पूर्वजों की आरती, धूप और हवन की पद्धति आज के पेस्ट कंट्रोल जैसी ही थी। लेकिन उनमें रिएक्शन ना हो इस बात का ध्यान रखा जाता था। पूजा-पाठ, हवन के दौरान सबकी मौजूदगी में घर और शरीर की अंदर बाहर से सफाई हो जाती थी। पेस्ट कंट्रोल की तरह कुछ घँटे या कुछ दिन घर छोड़कर नहीं रहना पड़ता था और ना ही घर को खाली रखना पड़ता था।

इस भाग में इतना ही, हम फिर मिलेंगे किसी और विषय की खोजपूर्ण जानकारी के साथ।

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